गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४२
निछावर कर बलैया लेंगी ॥ २ ॥ तुम्हारे किलकने, नाचने, चलने,
देखने और दौड़कर मिलनेकी मनोहरतासे तथा मणिमय खम्भोंमें
तुम्हारा प्रतिबिम्ब पड़नेसे आँगनमें छवि छलकने लगेगी ॥ ३ ॥
तुम्हारे बालविनोदके आनन्दरूप मनोहर चन्द्रकी ललित लीला रूप
चन्द्रिकासे महाराज दशरथका पुण्यरूप समुद्र उमड़ेगा और घर-
घरमें आनन्द-बधाई होने लगेगी ॥ ४ ॥ सभी लोग नेत्रोंका आनन्द
लूटकर पुण्य और सुखके भाजन होंगे तथा तुम्हारी तोतली बोली
सुननेवाले अनायास ही अपने जन्मका फल पा लेंगे' ॥ ५ ॥ तुलसी
दासजी कहते हैं कि राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके चरितरूप
सरितामें स्नान करनेवाले जैसे तत्कालीन अवधवासी थे वैसे ही आज
के भी समझने चाहिये ॥ ६॥
राग केदारा
[ १० ]
चुपिरि उबटि अन्हवाइकै नयन आँजे,
चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है।
भ्रूपर अनूप मसिबिंदु, बारे बाढ बार
बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ॥ १ ॥
मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि
देव कहैं, सबको सुकृत उपचियो है।
मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य,
पुन्यपुंज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ॥ २ ॥
लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु,
चाल चाहि सो छवि सुकबि जिय जियो है।
बालकेलि बातबस झलकि झलमलत
सोभाकी दीयटि मानो रूप-दीप दियो है ॥ ३ ॥