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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 446

गीतावली ४४०
[ ३५ ]
मुनिबर करि छठी कीन्ही बारहेंकी रीति ।
बन-बसन पहिराइ तापस, तोषि पोषे प्रीति ॥ १ ॥
नामकरन सुअन्नप्रासन बेद बांधी नीति ।
समय सब रिषिराज करत समाज साज समीति ॥ २ ॥
बाल लालहि, कहहिं 'करिहैं राज सब जग जीति ।'
राम-सिय-सुत, गुर-अनुग्रह, उचित, अचल प्रतीति ॥ ३ ॥
निरखि बाल-विनोद तुलसी जात बासर बीति ।
पिय-चरित सिय-चित-चितेरो लिखत नित हित भीति ॥ ४ ॥
मुनिवर वाल्मीकिने बालकोंकी छठी करके बारहवें दिनकी
रीति की। उस दिन उन्होंने तपस्वियोंको वनके वस्त्र पहनाकर
प्रीतिपूर्वक सन्तुष्ट किया ॥ १ ॥ वेदने जो नामकरण और अन्न-
प्राशन आदिका नियम बांधा है, ऋषिराज वाल्मीकिजीने समाज
और साजको जोड़कर समय-समयपर वे सभी कृत्य किये ॥ २ ॥
बालकोंको खेलाते समय वे कहते थे, 'ये तो सारे जगत्को जीतकर
राज्य करेंगे।' वे बालक प्रथम तो श्रीराम और सीताके पुत्र हैं,
दूसरे उनपर गुरुजीकी भी खूब कृपा है; इसलिये उनके लिये यह
उचित ही है और सब लोगोंको भी यही विश्वास होता था ॥ ३ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीके दिन तो बालकोंके चरित्र
देखनेमें निकल जाया करते थे तथापि उनका चित्तरूप चित्रकार
प्रेमरूप भित्तिपर प्रियतमके चरित्र बराबर चित्रित करता रहता
था ॥ ४ ॥