गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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राजाओंके अनुकूल वचन क्या कहला भेजूं । मुझे विश्वास है कि
[जिस प्रकार मेरे विरुद्ध बातें अयोध्यामें कही गयी हैं] उसी प्रकार
इस बार कोई सज्जन पुरुष आकर मेरे अनुकूल बातें भी कहेगा
॥२॥ कृपामय लषणलाल ! तुम मुझे एकाएकी भूल मत जाना
और राजधर्म ही समझकर सब तपस्विनियोंके समान मेरा भी पालन
करते रहना' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, सीताजीके ये वचन
सुनकर सब लोग नेत्रोंसे जल बरसाने लगे । [औरोंकी तो बात
हो क्या,] वाल्मीकिजी भी उस स्नेहके कारण अपनेको न सँभाल
सके ॥ ४ ॥
[ ३० ]
सुनि ब्याकुल भए, उतरु कछु कह्यो न जाइ ।
जानि जिय बिधि बाम दीन्हों मोहि सरुष सजाइ ॥ १ ॥
कहत हित मेरी कठिनई लखि गई प्रीति लजाइ ।
आजु अवसर ऐसेहू जौं न चले प्रान बजाइ ॥ २ ॥
इतहि सीय-सनेह-संकट उतहि राम रजाइ ।
मौनही गहि चरन, गौने सिख-सुआसिष पाइ ॥ ३ ॥
प्रेम-निधि पितु को कहे मैं परुष बचन अघाइ ।
पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ ॥ ४ ॥
ये सब बातें सुनकर लक्ष्मणजी व्याकुल हो गये, उनसे कुछ
भी उत्तर नहीं दिया गया; मनमें समझ लिया कि वाम विधाताने
कुपित होकर मुझे सजा दी है ॥ १ ॥ वे मन-ही-मन कहने
लगे—'अहो मेरी कठोरता देखकर प्रीति भी लज्जित हो गयी
जो आज ऐसे अवसरपर भी मेरे प्राणोंने कूच नहीं किया' ॥ २ ॥