गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४३२
'भलेहि नाथ,' सुहाथ माथे राखि राम-रजाइ ।
चले तुलसी पालि सेवक-धरम अवधि अघाइ ॥ ५ ॥
चतुरशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरोंसे गुप्त समाचारकी
बातें कीं । दूतोंके मुखसे लोकमतको जानकर अपने महलमें आ
श्रीसीताजीसे पूछा—॥ १ ॥ 'प्राणप्रिये ! तुम अपनी अभीष्ट रुचि
बतलाओ ।' तब सीताजीने सकुचाकर कहा—'मैं वनमें जाकर स्त्री
और बालकोंके सहित तपस्वियोंका पूजन करना चाहती हूँ' ॥ २ ॥
तब करुणासागर भगवान् रामने होनहारके वश सारी सहायता
उपस्थित देख, धैर्य धारणकर सवेरा होते ही लक्ष्मीजीको बुलाया
॥ ३ ॥ और कहा—'भैया ! तुम इसी समय रथ सजाकर उसपर
सीताजीको बिठा वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचा आओ' ॥ ४ ॥
तब 'प्रभो ! बहुत अच्छा' इस प्रकार कह अपने हाथोंको माथेपर
रखा (दुःख किया) और भगवान् रामकी आज्ञा शिरोधार्य की । वे
सेवकधर्मका पूर्णतया पालन करते हुए वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥
[ २८ ]
आइ लषन लै सौंपी सिय मुनीसहि आनि ।
नाइ सिर रहे पाइ आसिष जोरि पंकजपानि ॥ १ ॥
बालमीकि बिलोकि ब्याकुल लषन गरत गलानि ।
सरबबिद बूझत न, बिधिकी बामता पहिचानि ॥ २ ॥
जानि जिय अनुमानही सिय सहस बिधि सनमानि ।
राम सदगुन-धाम, परमिति भई कछुक मलानि ॥ ३ ॥
दीनबंधु दयालु देवर देखि अति अकुलानि ।
कहति बचन उदास तुलसीदास त्रिभुवन-रानि ॥ ४ ॥