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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

४२६ बालकाण्ड
थे ॥ ३ ॥ भगवान्‌के राजसमाजका वर्णन करके दीन तुलसीदास भी
यही माँगता है कि मुझे अपनाकर अपने चरणोंका परम पवित्र और
सुदृढ़ प्रेम दीजिये ॥ ४ ॥
सीता-बनवास
[ २४ ]
संकट सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ ।
सहस द्वादस पंचसतमें कछुक है अब आउ ॥ १ ॥
भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ ।
परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ॥ २ ॥
पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ ।
होइ हित केहि भांति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ॥ ३ ॥
निपट असमंजसहु बिलसति मुख मनोहरताउ ।
परम धीर-धुर्रीन हृदय किं हरष-बिसमय काउ ? ॥ ४ ॥
अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ ।
जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ॥ ५ ॥
राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ ।
परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ॥ ६ ॥
एक समय श्रीरघुनाथजी धर्मसंकट उपस्थित होनेपर मन-ही-
मन इस प्रकार सोचने लगे—‘अब मेरी बारह हजार पाँच सौ
वर्षकी आयुमें कुछ ही और शेष है ॥ १ ॥ उसके पश्चात् पिताकी
आयुका भोग है, और उसे भोगनेसे ही काम चलेगा; किन्तु उसे
भोगनेके लिये सीताजीको त्यागे बिना और कोई निर्दोष उपाय नहीं