गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२१ उत्तरकाण्ड
बसन्त बिहार
राग गौरी
[ २२ ]
अवध नगर अति सुंदर बर सरिताके तीर ।
नीति-निपुन नर-तिय सबहिँ, धरम-धुरंधर, बीर ॥ १ ॥
सकल रितुन्ह सुखदायक, तामहँ अधिक बसंत ।
भूप-मौलि मनि जहँ बस नृपति जानकीकंत ॥ २ ॥
बन उपवन नव किसलय, कुसुमित नाना रंग ।
बोलत मधुर मुखर खग पिकबर, गुंजत भृंग ॥ ३ ॥
समय बिचारि कृपानिधि, देखि द्वार अति भीर ।
खेलहुँ मुदित नारि-नर, बिहँसि कहेउ रघुबीर ॥ ४ ॥
नगर-नारि-नर हरषित सब चले खेलन फागु ।
देखि राम-छबि अतुलित उमगतउर अनुरागु ॥ ५ ॥
स्याम-तमाल-जलदतनु निरमल पीत दुकूल ।
अरुन-कंज-दल-लोचन सदा दास अनुकूल ॥ ६ ॥
सिर किरीट श्रुति कुंडल, तिलक मनोहर भाल ।
कुंचित केस, कुटिल भ्रू, चितवनि भवन-कृपाल ॥ ७ ॥
कल कपोल, सुक नासिक, ललित अधर द्विज जोति ।
अरुन कंज महँ जनु जुग पाँति रुचिर गज-मोति ॥ ८ ॥
बर दर-ग्रीव अमितबल बाहु सुपीन बिसाल ।
कंकन-हार मनोहर, उरसि लसति बनमाल ॥ ६ ॥
उर भृगु-चरन बिराजत, द्विज-प्रिय चरित पुनीत ।
भगत हेतु नर बिग्रह सुरबर गुन-गोतीत ॥ १० ॥
उदर त्रिरेख मनोहर, सुंदर नाभि गँभीर ।
हाटक-घटित, जटित मनि कटितट रट मंजीर ॥ ११ ॥