गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगी तावली ४०४
जीको जिन्होंने महामुनि [मुनीश्वरोंके समान क्षमाशील] बना
दिया है ! ॥ ५ ॥ जब राक्षसियोंने सीताजीको वियोगिनी जानकर
बहुत-सी अप्रिय बातें कहकर उन्हें व्यथित किया, तब उन भुजाओंने
शत्रुओंका संहार कर उन असुरपत्नियोंके सिर उघाड़कर उन्हें धाड़
मारकर रुलाया ॥ ६ ॥ रावणने तीनों लोकोंको विवश करके लोक-
पालोंको व्याकुल कर उनसे नाकों चने बिनवाये थे । [उसी
रावणके मारे जानेसे ] देवता, नाग और मनुष्यगण अपने-अपने
धामोंमें सुखपूर्वक बसकर अपनी पत्नियोंके सहित जिन भुजाओंका
सुयश गान करते हैं ॥ ७ ॥ जिन भुजाओंकी वेद, पुराण, शेष, शारदा
और शुकदेव भी स्नेहपूर्वक सराहना करते हैं, जो कल्पलताकी
भी श्रेष्ठ कल्पलता तथा कामधेनुकी भी कामधेनु हैं ॥ ८ ॥ तथा जो
अपने शरणागत दीन एवं प्रणत पुरुषोंको अभयपद देकर अन्ततक
उनका निर्वाह करती हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान्की वे
हीं भुजाएँ अपने दासोंपर सदा छाया करती आयी हैं, अब भी
करती हैं और आगे भी करती रहेंगी ॥ ९ ॥
राग भैरव
[ १४ ]
रामचंद्र-करकंज कामतरु बामदेव-हितकारी ।
तियसनेह-बर बेलि-ललित बर-प्रेम बंधु बर बारी ॥ १ ॥
मंजुल मंगल-मूल मूल तनु, करज मनोहर साखा ।
रोम परन, नख सुमन सुफल सब काल सुजन-अभिलाषा ॥ २ ॥
अबिचल अमल,अनामय,अबिरल, ललित, रहित छल छाया ।
समन सकल संताप-पाप-रुज-मोह-मान-मद-माया ॥ ३ ॥