गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३४
नामकरण
राग जैतश्री
[ ६ ]
बाजत अवध गहागहे आनंद-बधाए ।
नामकरन रघुबरनिके नृप सुदिन सोधाए ॥ १ ॥
पाय रजायसु रायको ऋषिराज बोलाए ।
सिष्य-सचिव-सेवक-सखा सादर सिर नाए ॥ २ ॥
साधु सुमति समरथ सबै सानंद सिखाए ।
जल, दल, फल, मनि-मूलिका, कुलि काज लिखाए ॥ ३ ॥
गनप-गौरि-हर पूजिकै गोबृन्द दुहाए ।
घर-घर मुद मंगल महा गुन-गान सुहाए ॥ ४ ॥
तुरत मुदित जहँ-तहँ चले मनके भए भाए ।
सुरपति-सासतु घन मनो मारुत मिला धाए ॥ ५ ॥
गृह, आँगन, चौहट, गली, बाजार बनाए ।
कलश, चँवर, तोरन, धुजा सुबितान तनाए ॥ ६ ॥
चित्र चारु चौकें रचीं, लिखि नाम जनाए ।
भरि-भरि सरवर-बापिका अरगजा सनाए ॥ ७ ॥
नर-नारिन्ह पल चारिमें सब साज सजाए ।
दसरथ-पुर छबि अपनी सुरनगर लजाए ॥ ८ ॥
बिबुध बिमान बनाइकै आनंदित आए ।
हरषि सुमन बरसन लगे, गए धन जनु पाए ॥ ६ ॥
बरे बिप्र चहुँ बेदके, रबिकुल-गुरु ग्यानी ।
आपु बसिष्ठ अथरबणी, महिमा जग जानी ॥ १० ॥
लोक-रीति बिधि बेदकी करि कह्यो सुबानी—
'सिसु-समेत बेगि बोलिए कौसल्या रानी' ॥ ११ ॥