गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६१ उत्तरकाण्ड
[ ६ ]
आजु रघुबीर-छबि जात नहिं कछु कहीं ।
सुभग सिंघासनासीन, सीतारवन,
भुवन-अभिराम, बहु काम सोभा सही ॥ १ ॥
चारु चामर-व्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल,
दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही।
मनहुँ राकेस सँग हंस-उडुगन-बरहि
मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही ॥ २ ॥
मुकुट सुंदर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू,
कुटिल कच, कुंडलनि परम आभा लही ।
मनहुँ हरडर जुगल मारध्वजके मकर
लागि श्रवननि करत मेरुकी बतकही ॥ ३ ॥
अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन,
बदन सुषमासदन, हास त्रय-तापही ।
बिबिध कंकन हार, उरसि गजमनि-माल,
मनहुँ बाग-पाँति जुगमिलि चली जलवही ॥ ४ ॥
पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल,
पृथुल-दामिनि रही छाइ तलि सहजही ।
ललित सायक-चाप पीन भुज बल अतुल
मनुजतनु दनुजबन-दहन, मंडन-मही ॥ ५ ॥
जासु गुन-रूप नहि कलित निरगुन सगुन,
संभु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही ।
दास तुलसी राम-चरन-पंकज सदा
बचन मन करम चहै प्रीति नित निरबही ॥ ६ ॥