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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 454 में से

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पृष्ठ 387

ॐ
श्रीसीतारामभ्यां नमः
गीतावली
—★★—
उत्तरकाण्ड
रामराज्य
राग सोरठ
[ १ ]
बनतें आइकै राजा राम भए भुआल ।
मुदित चौदह भुअन, सब सुख सुखी सब सब काल ॥ १ ॥
मिटे कलुष-कलेस-कु लषन, कपट-कुपथ-कुचाल ।
गए दारिद, दोष दारुन, दंभ-दुरित-दुकाल ॥ २ ॥
कामधुक महि, कामतरु तरु, उपल मनिगन लाल ।
नारि-नर तेहि समय सुकृति, भरे भाग सुभाल ॥ ३ ॥
बरन-आश्रम-धरमरत, मन बचन बेष मराल ।
राम-सिय-सेवक-सनेही, साधु, सुमुख, रसाल ॥ ४ ॥
राम-राज-समाज बरनत सिद्ध-सुर-दिगपाल ।
सुमिरि सो तुलसी अजहुँ हिय हरष होत बिसाल ॥ ५ ॥
बनसे आकर महाराज राम भूपति हुए। उनके राज्यमें
चौदहों भुवन आनन्दित हो गये और सब लोग सब समय सब
प्रकारके सुखोंसे सुखी रहने लगे ॥ १ ॥ सब प्रकारके पाप, क्लेश,
कुलक्षण, कपट, कुमार्ग और कुचाल नष्ट हो गये तथा दरिद्रता,
दारुण दोष, दम्भ, दुरित और दुष्काल आदिका नाम मिट गया ॥ २॥