गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३७०
तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै ।
उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ॥ ३ ॥
संजीवनी बूटी खाकर सचेत होनेपर [जब पीड़ा आदिके
विषयमें पूछा गया तो ] लक्ष्मणजी ने प्रेमसे पुलकित हो शरीरानु-
सन्धानको भूलकर कहा—'मेरे हृदयमें तो केवल घाव ही है, उसकी
पीड़ा तो रघुनाथजीको है ॥ १ ॥ जैसे तोतेसे कोई उसके पाठके
अर्थकी चर्चा करे, वैसे ही आप लोग बार-बार मुझसे क्या पूछते हैं;
हीरेके द्वारा शोभा, सुख तथा हानि या लाभ—ये सब तो राजाको
ही होते हैं, हीरेकी तो केवल कान्ति तथा कीमत ही होती है ॥ २ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं, लक्ष्मणजी के ये वचन सुनकर बड़े-बड़े धीर भी
धैर्य धारण नहीं कर सकते । उन राम और लक्ष्मणके प्रेमकी उपमा
दूध और पानीसे भी कैसे दी जाय ? ॥ ३ ॥
विजयी राम
राग कान्हरा
[ १६ ]
राजत राम काम सत-