गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६५ लंकाकाण्ड
[उनके मुखसे रामनाम सुन] उनके समीप जा अपनी भुजाओंमें
भरकरउनका आलिङ्गनकिया और उन्हें जीवनदान दिया। लक्ष्मणजी
मर्माहत हुए हैं—यह सुनकर तो उन्हें थोड़ा-सा दुःख हुआ, परंतु
हनूमान्जीको जीवित देखकर वे परम आनन्दित हुए ॥ ३ ॥
स्वामीकी आज्ञा इधर आयोध्यामें ही रहनेकी है और उधर उनपर
युद्धका संकट पड़ा हुआ है—इसपर भरतजीने बहुत कुछ विचार
किया, परंतु उनसे कुछ करते न बना। तुलसीदासजी कहते हैं,
[भरतजीकी अवस्था उस समय ऐसी थी] जैसे आकाश फट जाय
तो उसे कैसे सिया जाय ? ॥ ४ ॥
[ ११ ]
भरत-सत्रुसूदन बिलोकी कपि चकित भयो है।
राम-लषन रन जीति अवध आए, कैधौं मोहि भ्रम,
कैधौं काहू कपट ठयो है॥ १ ॥
प्रेम पुलकि, पहिचानिकैं पदपदुम नयो है।
कह्यो न परत जेहि भांति दुहु भाइन
सनेहसों उर लाय लयो है॥ २ ॥
समाचार कह गहरु भो, तेहि ताप तयो है।
कुधर सहित चढ़ौ बिसिख, बेगि, पठवौं, सुनि
हरि हिय गरब गूढ़ उपयो है॥ ३ ॥
तीरतें उतरि जस कह्यो चहैं, गुनगननि जयो है।
धनि भरत ! धनि भरत ! करत भयो,
मगन मौन रह्यो मन अनुराग रयो है॥ ४ ॥
यह जलनिधि खन्यो, मथ्यो, लँघ्यो,बांध्यो,अँचयो है।
तुलसिदास रघुबीर बंधु-महिमाको सिंधु
तरि को कसि पार गयो है ? ॥ ५ ॥