गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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भजन-प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो।
तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार बरिया ॥ ४ ॥
'रघुनाथजीके सिवा और कोई भजने योग्य नहीं है। भला उनके
समान और किसका हृदय कृपासे पूर्ण है? ॥ बतलाओ, और
किस देवताने शिलाका उद्धार करके केवटको मित्र बनाया है और
किसने महापतित गृध्रको पिताके समान अपने हाथोंसे पिण्ड दिया
है ॥ २ ॥ ऐसा कौन देवता है जिसने शबरीके फल खाकर जल
पिया हो; और बालिके भयरूप समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको भी
किसने बाँह पकड़कर निकाला है;' ॥ ३ ॥ इस प्रकार जब विभीषण-
ने भगवान्के भजनका प्रभाव कहा तो सारी वानरसेना सुनकर
सजीव हो गयी। वास्तवमें तुलसीदासके प्रभु कौसलपति श्रीराम ही
सब प्रकारसे बली (उत्कृष्ट) हैं ॥ ४ ॥
जानकी-त्रिजटा-संवाद
राग जैतश्री
[ ४७ ]
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति ?
राजिवदल-नयन, कोमल, कृपा-अयन,
मयननि बहु छबि अंगनि दूरति ॥ १ ॥
सिरसि जटा-कलाप, पानि सायक,
चाप, उरसि रुचिर बनमाल लूरति ।
तुलसिदास रघुबीरकी सोभा सुमिरि,
भई है मगन नहि तनकी सूरति ॥ २ ॥
[जानकीजी कहती हैं-] 'मैं इन नयनोंसे वह मधुर मूर्ति
कब देखूँगी ! जिसके कमलदलके समान नेत्र हैं, जो अत्यन्त