गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३४४
'प्रभो ! पुरुषोंने आपका 'दीनहितकारी' ऐसा सुयश गाया
है। मैं भी आपको दीनबन्धु, कृपालु और मृदुलचित्त जानकर ही
शरणमें आया हूँ ॥ १ ॥ मैं राक्षसवंशमें उत्पन्न हुआ आपके शत्रु
रावणका छोटा भाई विभीषण हूँ । प्रभुका गुण, शील और स्वभाव
सुनकर मैंने आपके ही चरणोंमें चित्त लगाया है ॥ २ ॥ प्रभु अपने
दासोंका सुख-दुःख जानते ही हैं, इसलिये मैंने उसका कथन नही
किया। अब तो जब आप मुझे करुणा करके नेत्र भरकर निहारेंगे
तभी मैं जानूँगा कि आपने मुझे अपनाया है, ॥ ३ ॥ विभीषणके
ये विनीत वचन सुनकर रघुनाथजीने उसे हँसकर अपने पास
बुलाया, फिर भगवान्ने उसे भरतजीके समान भुजाओंमें भरकर
आलिंगन किया और उसे मन-ही-मन लङ्कापति मान। ॥ ४ ॥ फिर
अपने करकमलसे उसका सिर स्पर्श कर उसे अभय किया और
इस प्रकार प्रभुने अपने भक्तपर प्रेम प्रगट किया । तुलसीदासजी
कहते हैं, रघुनाथजीका भजन करके भला किसने परमपद प्राप्त नहीं
किया; ॥ ५ ॥
राग धनाश्री
[ ४५ ]
सत्य कहौं मेरो सहज सुभाउ ।
सुनहु सखा कपिपति लंकापति, तुम्हसन कौन दुराउ ॥ १ ॥
सब बिधि हीन-दीन, अति जड़-मति जाको कतहूँ न ठाउँ ।
आयो सरन भजौं, न तजौं तिहि, यह जानत रिषिराउ ॥ २ ॥
जिन्हके हौ हित सब प्रकार चित, नाहिन और उपाउ ।
तिन्हहि लागि धरि देह करौं सब, डरौं न सुजस नसाउ ॥ ३ ॥
पुनि पुनि भुजा उठाइ कहत हौं, सकल सभा पतिआउ ।
नहि कोऊ प्रिय मोहि दास सम, कपट-प्रीति र्बाह जाउ ॥ ४ ॥