गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३४१
राम राजीव-लोचन बिमोचन बिपति,
स्याम नव-तामरस-दाम बारिद-बरन ।
लसत जटाछूट सिर, चारु मुनिचीर कटि,
घोर रघुबीर तूनीर-सर-धनु-धरन ॥ २ ॥
जातुधानेस-भ्राता बिभीषन नाम
बंधु-अपमान गुरु ग्लानि चाहत गरन ।
पतितपावन ! प्रनतपाल ! करुनासिंधु !
राखिए मोहि सौमित्रि-सेवित-चरन ॥ ३ ॥
दीनता-प्रीति-संकलित मृदुबचन सुनि
पुलकि तन प्रेम, जल नयन लागे भरन ।
बोलि, 'लंकेस' कहि अंक भरि भेंटि प्रभु,
तिलक दियो दीन-दुख-दोष-दारिद-दरन ॥ ४ ॥
रातिचर-जाति, अकारि सब भाँति गत
कियो सो कल्यान-भाजन सुमंगलकरन ।
दास तुलसी सदयहृदय रघुबंसमनि
'पाहि' कहे काहि इन्हों न तारन तरन ? ॥ ५ ॥
[विभीषण कहते हैं—] 'नाथ ! मैं अपने कानोंसे आपकी
सुयश सुनकर शरणमें आया हूँ। आप पाषाणरूपी अहल्या,
केवट, गृध्र, और शबरीके आवागमनरूप संसृतिचक्रको शांत
करनेवाले तथा शोक और श्रमके सीमारूप सुग्रीवका दुःख
करनेवाले हैं ॥ १ ॥ हे राम ! आप कमलके समान नेत्रोंवाले, सब
प्रकारकी विपत्तियोंके नाशक, नवीन नीलकमलकी-सी श्यामल
कान्तिवाले तथा मेघवर्ण हैं, आपके सिरपर जटाजूट शोभायमान
हैं। कमरमें मनोहर मुनिवस्त्र है तथा आप धनुष-बाण और तरकस