गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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मानता था [अर्थात् महादरिद्र था] वही तुलसी अब पपीहा होकर
रामरूप श्यामसुन्दर मेघसे याचना करता है ॥ ४ ॥
[ ४१ ]
अति भाग बिभीषनके भले ।
एक प्रनाम प्रसन्न राम भए, दुरित-दोष-दारिद दले ॥ १ ॥
रावन-कुंभकरन बर माँगत सिव-बिरंचि बाचा छले ।
राम-दरस पायो अबिचल पद, सुदिन सगुन नीके चले ॥ २ ॥
मिलनि बिलोकि स्वामि-सेवककी ऊकठे तरु फूले-फले ।
तुलसी सुनि सनमान बंधुको दसकंधर हँसि हिये जले ॥ ३ ॥
विभीषणजीके भाग्य बड़े ही अच्छे हैं, जिनके एक प्रणामसे
ही भगवान् राम प्रसन्न हो गये और उनके सारे पाप, दोष तथा
दरिद्रता दूर कर दी ॥ १ ॥ जिस समय रावण और कुम्भकर्णने वर
मांगा था, उस समय वे शिव और ब्रह्माद्वारा वाणीके फेरसे छले गये
[अर्थात् वे माँगना कुछ चाहते थे और शब्दार्थके फेर-फारसे उन्हें
कुछ और ही मिला] किन्तु विभीषणने तो रामके दर्शनमात्रसे ही
अविचल पद प्राप्त कर लिया (उन्हें मांगनेकी भी आवश्यकता नहीं
पड़ी) वास्तवमें वे अच्छे दिन अच्छे शकुनसे चले थे ॥ २ ॥ स्वामी
और सेवकका वह सम्मिलन देखकर सूखे वृक्ष भी फूलने-फलने लगे।
तुलसीदासजी कहते हैं, भाईका सम्मान हुआ सुनकर रावण मुखसे
तो हँसने लगा, किन्तु हृदयमें ईर्ष्यानल से जल उठा ॥ ३ ॥
[ ४२ ]
गये राम सरन सबको भलो ।
गनी-गरीब, बड़ो-छोटो, बुध-मूढ़, हीनबल-अतिबलो ॥ १ ॥