गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३३ सुन्दरकाण्ड
【 ३५ 】
चले लेन लषन-हनुमान हैं।
मिले मुदित बूझि कुसल परसपर-सकुचत करि सनमान हैं ॥ १ ॥
भयो रजायसु पांउ धारिए, बोलत कृपानिधान हैं।
दूरितें दीनबंधु देखे, जनु देत अभय-बरदान हैं ॥ २ ॥
सील सहस हिमभानु, तेज सतकोटि भानुहूके भानु हैं।
भगतनिकोहित कोटि मातु-पितु अरिन्हको कोटि कुसानु हैं ॥ ३ ॥
जनगुनरज गिरि गनि, सकुचत निज गुन गिरि रज परमानु हैं।
बाँह-पगारु, बोलको अबिचल, बेद करत गुनगान हैं ॥ ४ ॥
चारु चाप-तूनोर तामरस-करनि सुधारत बान हैं।
चरचा चलति बिभीषनकी, सोइ सुनत सुचित दै कान हैं ॥ ५ ॥
हरषत सुर, बरषत प्रसून सुभ सगुन कहत कल्यान हैं।
तुलसी ते कृतकृत्य, जे सुमिरत समय सुहावनो ध्यान हैं ॥ ६ ॥
तब विभीषणको लेनेके लिये लक्ष्मणजी और हनुमान्जी चले।
वे प्रसन्नतापूर्वक मिले और कुशल पूछकर परस्पर सम्मान करते हुए
सकुचाने लगे ॥ १ ॥ वे बोले—'पधारिये, भगवान्की आज्ञा हो
गयी है, कृपानिधान रघुनाथजी आपको बुला रहे हैं।' तब विभीषण-
ने दूरहीसे प्रभुको देखा, मानो वे अभयका वर दे रहे हैं ॥ २ ॥
तथा शान्तिमें सहस्रों चन्द्रमाओंके समान, तेजमें अरबों सूर्योंके भी
सूर्य, भक्तोंके लिये करोड़ों माता-पिताओंके समान हितकारी और
शत्रुओंके लिये करोड़ों अग्नियोंके समान हैं ॥ ३ ॥ वे अपने भक्तके
रजंतुल्य गुणोंको पर्वत-समान समझकर सकुचाते हैं और अपने
पर्वततुल्य गुणको रजवत् समझते हैं। प्रभु अपनी भुजाओंसे
शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और प्रतिज्ञाके पक्के हैं, ऐसा वेद