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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 454 में से

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पृष्ठ 337

३३१ सुन्दरकाण्ड.
बुलाया ॥ १ ॥ [ तथा उनसे पूछा— ] 'आपलोग इस सम्बन्धमें
क्या समझते हैं ?' प्रभुकी आज्ञा पा उन्होंने धर्म और नीतिके
अनुकूल उत्तर दिये । वे बोले—प्रभो ! यह महाबलवान् और
उसका भाई है जिसने मोहबस बरबस ही आपके प्रति शत्रुताके
बीज बोये हैं [ इसलिये इससे सावधान रहना ही ठीक है ] ॥ २ ॥
परंतु हे बाँह-पगार (अपनी भुजारूप दीवारसे आश्रितकी रक्षा
करनेवाले) ! आपके द्वारपर आकर कोई भी भयभीत कभी उलटा
नहीं लौटा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके 'अशरण-शरण' ऐसे
विरद तो नित्य नये विराजमान हैं ॥ ३ ॥
[ ३३ ]
हिय बिहसि कहत हनुमानसों ।
सुमति साधु सुचि सुहृद बिभीषन बूझि परत अनुमानसों ॥ १ ॥
'हौं बलि जाउँ और को जानै ?' कह्यो कपि कृपानिधानसों ।
छली न होइ स्वामि सनमुख, ज्यों तिमिर सातहय-जानसों ॥ २ ॥
खोटो खरो सभीत पालिये सो, सनेह सनमानसों ।
तुलसी प्रभु कीबो जो भलो, सोइ बूझि सरासन-बानसों ॥ ३ ॥
तब रघुनाथजी हृदयमें हँसकर हनूमान्‌जीसे कहने लगे—
'अनुमानसे तो मुझे विभीषण सुमति, साधु, शुद्धचित्त और सुहृद
ही जान पड़ता है' ॥ १ ॥ तब हनूमान्‌जीने कृपानिधान भगवान्
रामसे कहा—'मैं बलिहारी जाऊँ, आपसे बढ़कर इस विषयमें
और कौन जान सकता है ? जिस प्रकार अन्धकार सूर्यके सम्मुख
नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार छली पुरुष तो प्रभुके सामने भी
नहीं आ सकता ॥ २ ॥ यह भयभीत है; अतः यह अच्छा हो या