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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

गीतावली ३२६
. पास पहुँचनेके लिये, मेरा उपदेश मानकर तुम किसी प्रकारका
बेड़ा मत बाँधो [अर्थात् किसी प्रकारकी तैयारी मत करो]।'
तुलसीदासजी कहते हैं, यह सुनकर विभीषणजी प्रसन्न होकर चल
दिये। राहमें उन्हें अनेकों शुभ शकुन हुए, मानो कोई कंगाल मणियों-
की ढेरी लूटनेके लिये जाता हो ॥ ३ ॥
राग केदारा
[ २८ ]
संकर-सिख-आसिष पाइकैं।
चले मनहि मन कहत बिभीषन सीस महेसहि नाइकै ॥ १ ॥
गए सोच, भए सगुन, सुमंगल दस दिसि देत देखाइकें।
सजल नयन, सानंद हृदय, तनु प्रेम-पुलक अधिकाइकें ॥ २ ॥
अंतहु भाव भलो भाईको, कियो अनभलो मनाइकै।
भइ कूबरकी लात, बिधाता राखी बात बनाइकै ॥ ३ ॥
नाहित क्यों कुबेर घर मिलि हर हितु कहते चित लाइकै।
जो सुनि सरन राम ताके मैं निज बामता बिहाइकै ॥ ४ ॥
अनायास अनुकूल कूलधर मग मुदमूल जनाइकै।
कृपासिंधु सनमानि, जानि जन दीन लियो अपनाइकै ॥ ५ ॥
स्वारथ-परमारथ करतलगत, श्रमपथ गयो सिराइकै।
सपने के सौतुक, सुख-सस सुर सींचत देत निराइकै ॥ ६ ॥
गुरु गौरीस, साँइ सीतापति, हित हनुमानहि जाइकै।
मिलिहौं, मोहि कहा कीबे अब, अभिमत, अवधि अघाइकें ॥ ७ ॥
मरतो कहाँ जाइ, को जाने, लटि लालची ललाइकै।
तुलसिदास भजिहौं रघुबीरहि अभय-निसान बजाइकै ॥ ८ ॥
श्रीमहादेवजीका उपदेश और आशीर्वाद पा विभीषणजी उन्हें