गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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राक्षसोंके आहार हैं; तिसपर भी इन राजकुमारोंको यह माँगी हुई
सेना प्राप्त हुई है। कालका खेल तो देखो, आज चींटियोंके पर
लगने लगे; मेरे भाग्यसे ही लोगोंकी चितचाही हुई है [इसीसे उन्हें
अनायास भरपेट आहार मिला है] ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते
हैं, तब विभीषणने प्रणाम कर कहा—'महाराज ! आपकी जैसी
आज्ञा है वही होगा, सचमुच आज त्रिलोकीमें साहस और सैन्य-
बलमें आपके समान कोई नहीं है; [परंतु उधरका भी बल देख
लीजिये।] भगवान् रामने [बालिवधके समय] संकल्पमात्रसे ही
सात तालवृक्षोंको वेध दिया था और वानर हनुमान्ने खेलहीमें
लङ्काको भस्म कर दिया था !' ॥ ४ ॥
[ २५ ]
दूसरो न देखतु साहिब सम रामै ।
बेदऊ पुरान, कबि-कोबिद बिरंच-रत,
जाको जस सुनत गावत गुन-ग्रामै ॥ १ ॥
माया-जीव, जग-जाल, सुभाउ, करम-काल,
सबको सासकु, सब मैं, सब जामैँ ।
बिधि-से करनिहार, हरिसे, पालनिहार
हर-से हरनिहार जपै जाके नामैँ ॥ २ ॥
सोइ नरबेष जानि, जनकी बिनती मानि,
मतौ नाथ सोई, जातें भलो परिनामैं ।
सुभट-सिरोमनि कुठारपानि सारिखेहू
लखी श्रौ लखाई, इहाँ किए सुभ सामैं ॥ ३ ॥
बचन-बिभूषन बिभीषन-बचन सुनि
लागे दुख दूषन-से दाहिनेउ बामैं ।