गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१७ सुन्दरकाण्ड
प्रयत्न किया, परंतु वे शब्द न निकाल सके। तुलसीदास कहते हैं,
तब अन्तमें प्रभुने सखा सुग्रीव और भाई लक्ष्मणसे संकेतद्वारा कहा
कि 'सेना सजाकर चलो' ॥ ४ ॥
वानरसेनाकी लंकायात्रा
राग मारू
[ २२ ]
जब रघुबीर पयानो कीन्हों।
क्षुभित सिंधु, डगमगत महीधर, सजि साहँग कर लीन्हों ॥ १ ॥
सुनि कठोर टंकोर घोर अति चौंके बिधि-त्रिपुरारि।
जटापटल ते चली सुरसरी सकत न संभु संभारि ॥ २ ॥
भए बिकल दिग्पाल सकल, भय भरे भुवन दसचारि।
खरभर लंक, ससंक दसानन, गरभ स्रवहिं अरि-नारि ॥ ३ ॥
कटकटात भट भालु, बिकट मरकट करि केहरि-नाद।
कूदत करि रघुनाथ-सपथ उपरी-उपरा बदि बाद ॥ ४ ॥
गिरि तरुधर, नख मुख कराल, रद फालहु करत बिषाद।
चले दस दिसि रिस भरि 'धनु धरु' कहि, 'को बराक मनुजाद'? ॥ ५ ॥
पवन पंगु पावक-पतंग-ससि दुरि गए, थके बिमान।
जाचत सुर निमेष, सुरनायक नयन-भार अकुलान ॥ ६ ॥
गए पूरि सर धूरि, भूरि भय अग थल जलधि समान।
नभ-निसान, हनुमान-हांक सुनि समुझत कोउ न अपान ॥ ७ ॥
दिग्गज-कमठ-कोल-सहसानन धरत धरनि धरि धीर।
बारहि बार अमरषत, करषत, करकें परीं सरीर ॥ ८ ॥
चली चमू, चहु ओर सोर, कछु बनै न बरने भीर।
किलकिलात, कसमसत, कोलाहल होत नीरनिधि तीर ॥ ९ ॥