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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 454 में से

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पृष्ठ 306

गीतावली ३००
आरज-सुवनके तो दया दुवन्हुपर,
मोहि सोच, मोतें सब बिधि नसानि ।
अपनौ भलाई भलो कियो नाथ सबहीको,
मेरे ही दिन सब बिसरी बानि ॥ ३ ॥
नेम तौ पपीहाहीके, प्रेम प्यारो मीनहीके,
तुलसी कही है नीके हृदय आनि ।
इतनी कही सो कही सोय, ज्योंही त्योंही
रही, प्रीति परी सही, बिधिसों न बसानि ॥ ४ ॥
'हे तात ! इस समय तुमसे बात कहते हुए भी चित्तमें खेद होता
है। मेरे चित्तका जो पहला प्रण था [कि पतिके बिना प्राण नहीं रखूँगी]
उसे याद कर और शरीरको विद्यमान जान, इस नयी गतिको देखकर
मेरी बुद्धि मलिन हो रही है ॥ १ ॥ अपने चित्तका विश्वास करके
ही मैंने पतिके वचनका उल्लंघन किया और बड़ा लाभ समझकर
उनके साथ साथ वनको चली आयी। हे पुत्र ! पतिका वियोग तो स्नेह-
का सर्वस्व लुटना है। [उस समय मुझे अवश्य प्राण त्याग देने चाहिये
थे, परन्तु मुझसे ऐसा नहीं बना।] सच है, अवसर चूक जानेके
समान और कोई हानि नहीं है ॥ २ ॥ आर्यपुत्रकी तो शत्रुओंपर
भी दया है; मुझे तो इसी बातका शोक है कि मुझसे सब प्रकार
उलटा ही हुआ है। प्रभुने अपनी भलमनसाहतसे ही सबकी भलाई
की है; पर मेरे ही दिन (मेरे ऊपर कृपा करनेके अवसरपर ही)
उन्हें अपना स्वभाव विस्मृत हो गया है ॥ ३ ॥ भैया ! नियम तो
पपीहाका और प्यारा प्रेम तो मछलीका ही है जिसे लोगोंने भली-
भाँति हृदयमें विचारकर कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि