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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 454 में से

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पृष्ठ 305

२६६ सुन्दरकाण्ड
क्यों न बजावेगा ? ॥२॥ मैं रघुनाथजीकी कृपासे आज ही शत्रु का
तिरस्कार कर हठपूर्वक तुम्हें ले जा सकता हूँ; किन्तु स्वामीकी
आज्ञा भंग करने से डरता हूँ और इससे देवताओंका काम भी
बिगड़ता है ॥ ३ ॥ मातः ! तुम हृदयमें धैर्य धारण करो; दोनों
भाई चार दिन पीछे ही समुद्रपर पुल बांध, शत्रुको परास्तकर रीछ
और वानरोंकी सेनाके सहित तुमसे मिलेंगे ॥ ४ फिर हनूमान्-
जीने चित्रकूटकी कथा और रघुनाथजीकी कुशल कह उन्हें सिर
नवाया। इससे उन्हें स्वामीका प्रिय दास समझकर सीताजीने अटल
आशीर्वाद दिया ॥ ५ ॥ हनूमान्‌जीके वचनामृत सुनकर सीताजीके
कान, शरीर और हृदय तो शीतल हो गये; अब नेत्रोंको केवल
भगवान्‌के दर्शनोंकी ही भूख रह गयी है ॥ ६ ॥
[ ७ ]
तात ! तोहूसों कहत होति हिये गलानि ।
मनको प्रथम पन समुझि अछत तनु
लखि नइ गति भइ मति म्लानि ॥ १ ॥
पियको बचन परिहरयो जियके भरोसे
संग चली बन बड़ो लाभ जानि ।
पीतम-बिरह तौ सनेह सरबसु सुत !
औसरकौ चूकिबो सरिस न हानि ॥ २ ॥
१. इन्द्रके पुत्र जयन्तकी कथा । इस कथाको सुनानेमें हनूमान्‌जीके
दो अभिप्राय थे । एक तो यह कि जिस प्रकार तुमसे विरोध करनेके
कारण जयन्तकी दुर्दशा हुई थी, उसी प्रकार अब रावण भी बच नहीं
सकता । दूसरे इसे सुनाकर उन्होंने रघुनाथजीके प्रिय दूत होनेकी साक्षी
दी; क्योंकि यह कथा बहुत गुप्त थी ।