गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २३२
भालुनाथ-नल-नील साथ चले, बली बालिको जायो ।
फरकि सुअँग भए सगुन, कहत मानो मग मुद-मंगल छायो ॥ २ ॥
देखि बिबर, सुधि पाइ गीधसों सबनि अपनो बलु मायो ।
सुमिरि राम, तकि तरकि तोयनिधि, लंक लूक-सो आयो ॥ ३ ॥
खोजत घर-घर, जनु दरिद्र-मनु फिरत लागि धन घायो ।
तुलसी सिय बिलोकि पुलक्यो तनु, भूरिभाग भयो भायो ॥ ४ ॥
जिस समय भगवान् रामकी आज्ञा मिली, उस समय पवनपुत्र
हनुमान्जीने भगवान्की दी हुई मुद्रिका (अँगूठी) को मुखमें डाल
उन्हें प्रसन्नचित्तसे सिर नवाया ॥ १ ॥ उनके साथ जाम्बवान्,
नल, नील और बालिपुत्र वीरवर अङ्गद चले । चलते समय उनके
शुभ अङ्ग फड़ककर शकुन हुए, जो मानो मार्गके आनन्दपूर्ण और
मङ्गलमय होनेकी सूचना देते थे ॥ २ ॥ मार्गमें उन्होंने एक गुहाका
निरीक्षणकिया और फिर गृध्रराज सम्पातीसे सीताजीका पतापा सबने
अपने-अपने बलका अन्दाज लगाया । [ अन्तमें जाम्बवान्के उत्तेजित
करनेपर] हनुमान्जी भगवान् रामका स्मरण कर, समुद्रका ओर
ताककर और उसे लाँघकर आकाशमें जाती हुई उल्काकी तरह
लङ्कापुरीमें आये ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जिस प्रकार धनके
लिये दरिद्रका मन भटकता फिरता है, उसी प्रकार घर-घरमें ढूंढ़ते-
ढूंढ़ते अन्तमें सीताजीका दर्शन होनेपर उनका शरीर पुलकित हो
गया । इस प्रकार अभीष्ट सिद्ध होनेपर उन्होंने अपनेको बड़भागी
समझा ॥ ४ ॥
[ २ ]
देखी जानकी जब जाइ ।
परम धीर समीरसुतके प्रेम उर न समाइ ॥ १ ॥