गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८१ अरण्यकाण्ड
[ १४ ]
नीके कै जानत राम हियो हौं।
प्रनतपाल, सेवक-कृपालु-चित, पितु-पटतरहि दियो हौं ॥ १ ॥
त्रिजगजोनि-गत गीध, जनम भरि खाइ कुजंतु जियो हौं ।
महाराज सुकृती-समाज सब-ऊपर आजु कियो हौं ॥ २ ॥
श्रवन, बचन, मुख नाम, रूप चख, राम उछंग लियो हौं ।
तुलसी मो समान बड़भागी को कह सके बियो हौं ॥ ३ ॥
'हे राम ! मैं आपके हृदयको अच्छी तरह जानता हूँ। आप
शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और सेवकोंपर कृपालु हैं। इसीलिये
मुझे पिताकी तुलना दी है ॥ १ ॥ मैं तिर्यक् योनिके अन्तर्गत गीध
जातिमें उत्पन्न हुआ और बहुत-से नीच जन्तुओंको खाकर जगत्में
जीवित रहा; उसे महाराज ! आज आपने पुण्यात्माओंके समाजमें
सबसे ऊपर कर दिया ! ॥ २ ॥ अहा ! मैं कानोंसे आपके वचन
सुन रहा हूँ; मुखसे नाम ले रहा हूँ; नेत्रोंसे रूप निहार रहा हूँ
और मुझे आपने स्वयं अपनी गोदमें ले रखा है। फिर बतलाइये,
दूसरा ऐसा कौन है जो अपनेको मेरे समान बड़भागी बतला
सके ?' ॥ ३ ॥
[ १५ ]
मेरे जान तात ! कछू दिन जीजै ।
देखिय आपु सुवन-सेवासुख, मोहि पितुको सुख दीजै ॥ १ ॥
दिब्य-देह, इच्छा-जीवन जग बिधि मनाइ माँगि लीजै ।
हरि-हर-सुजस सुनाइ, दरस दै, लोग कृतारथ कीजै ॥ २ ॥
देखि बदन, सुनि बचन, अमिय, तन रामनयन-जल भीजै ।
बोल्यो बिहग बिहँसि रघुबर ! बलि, कहौं सुभाय, पतीजै ॥ ३ ॥