गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६५ अयोध्याकाण्ड
'हे राघव ! तुम एक बार तो अवश्य लौट आओ। यहाँ
अपने इन श्रेष्ठ घोड़ोंको देखकर फिर वनमें चले जाना ॥ १ ॥
जिन्हें तुमने दूध पिलाकर, अपने ही करकमलोंसे पुष्टकर बारम्बार
पुचकारा था, ऐ मेरे लाड़िले राम ! वे अब एकाएकी भूल जानेसे
कैसे जीवित रह सकेंगे ! ॥ २ ॥ तुम्हारे अत्यन्त प्रिय जानकर
यद्यपि भरतजी इनकी सौगुनी सँभाल रखते हैं, तो भी पालेके मारे
हुए कमलके समान ये दिन-दिन दुर्बल होते जा रहे हैं ॥ ३ ॥
अरे पथिको ! सुनो, यदि तुम्हें वनमें राम मिल जायें तो तुम उनसे
माताका यही सन्देश कहना कि मुझे सबसे बढ़कर इन घोड़ोंकी ही
चिन्ता है' ॥ ४ ॥
राग केदारा
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काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए।
चित्रकूटतें राम-लषन-सिय सुनियत अनत सिधाए ॥ १ ॥
सैल, सरित, निरझर, बन, मुनि-थल देखि-देखि सब आए।
कहत सुनत सुमिरत सुखदायक, मानस-सुगम सुहाए ॥ २ ॥
बढ़ अवलंब वाम-विधि विघटित बिषम बिषाद बढ़ाए।
सिरिस-सुमन-सुकुमार मनोहर बालक बिंध्य चढ़ाए ॥ ३ ॥
अवध सकल नर-नारि बिकल अति, अकनि बचन अनभाए।
तुलसी राम-बियोग-सोग-बस, समुझत नहि समुझाए ॥ ४ ॥
किसीसे किसीने ऐसी खबर पायी है कि राम, लक्ष्मण और
सीता चित्रकूटसे कहीं अन्यत्र चले गये—ऐसी सुना जाता है ॥ १ ॥