गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१ बालकाण्ड
नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग।
मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ॥ १४ ॥
उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान।
सुनि किंनर गन्धरब सराहत, बिथके हैं बिबुध बिमान ॥ १५ ॥
कुंकुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल अबीर।
नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भइ मन भावति भीर ॥ १६ ॥
बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद।
दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ॥ १७ ॥
ब्राह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान।
निकसत पैठत लोग परस्पर बोलत लगि लगि कान ॥ १८ ॥
बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषी पुर-सुमुखि समान।
बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ॥ १६ ॥
कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास।
कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस बिबस रनिवास ॥ २० ॥
रानिन दिये बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार।
मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ॥ २१ ॥
बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ।
सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ॥ २२ ॥
अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं।
समउ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ॥ २३ ॥
को कहि सकै अवधवासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह।
सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ॥ २४ ॥
सिव-बिरंचि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग।
तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ॥ २५ ॥