गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु ।
नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ॥ २ ॥
व्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल ।
सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ॥ ३ ॥
भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान ।
जहँ-तहँ सर्जाहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ॥ ४ ॥
सींचि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार ।
दल फल फूल दूध दधि रोचन, घर घर मङ्गलाचार ॥ ५ ॥
सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत ।
लिए बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ॥ ६ ॥
जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिए महिदेवन दान ।
तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ॥ ७ ॥
आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ ।
उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहैं कबि कोइ ॥ ८ ॥
सजि आरती बिचित्र थार कर जूथ जूथ बरनारि ।
गावत चलीं बधावन लै लै निज निज कुल अनुहारि ॥ ६ ॥
असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद ।
नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ॥ १० ॥
लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति भाँति भरि भार ।
करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राज दुवार ॥ ११ ॥
गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज ।
जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ॥ १२ ॥
घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार ।
नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ॥ १३ ॥