गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर वनकी] समता और विषमता अथवा सुगमता और दुर्गमता
दिखायी भी नहीं देती [अर्थात् भरतजीको अयोध्याका सुख प्रतीत
नहीं होता और रघुनाथजीको वनका दुःख नहीं जान पड़ता]॥ ४ ॥
[ ८१ ]
मोहि भावति, कहि आवति नहि भरतजूकी रहनि ।
सजल नयन सिथिल बयन प्रभु-गुन-गन कहनि ॥ १ ॥
असन-बसन-अयन-सयन धरम गरुअ गहनि ।
दिन दिन पन-प्रेम-नेम निरुपाधि निरबहनि ॥ २ ॥
सीता-रघुनाथ-लखन-बिरह-पीर सहनि ।
तुलसी तजि उभय लोक रामचरन-चहनि ॥ ३ ॥
भरतजीका रहन-सहन मुझे बड़ा प्रिय लगता है, किन्तु कहा
नहीं जाता ॥ उनका वह सजल नेत्र और शिथिल वाणीसे प्रभुका
गुणगान करना ॥ १ ॥ भोजन, वस्त्र, गृह और शयन-सम्बन्धी कठोर
धर्मोंका ग्रहण करना, दिनोंदिन निरुपाधि, प्रतिज्ञा, प्रेम और नियमको
निभाना ॥ २ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके वियोगकी व्यथा
सहन करना तथा लोक-परलोक दोनोंका त्याग कर केवल भगवान्
रामके चरणोंकी इच्छा करना [ये सभी अकथनीय हैं] ॥ ३ ॥
[ ८२ ]
जानी है संकर-हनुमान-लषन-भरत राम-भगति ।
कहत सुगम, करत अगम, सुनत मीठी लगति ॥ १ ॥
लहत सकृत, चहत सकल, जुग जुग जगमगत्ति ।
राम-प्रेम-पथतें कबहूँ डोलति नहिं, डगति ॥ २ ॥
रिद्धि-सिद्धि, बिधि चारि सुगति जा बिनु गति अगति ।
तुलसी तेहि सनमुख बिनु बिषय-ठगिनि ठगति ॥ ३ ॥