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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

२४५ अयोध्याकाण्ड
[भरतजी कहते हैं—] बताओ तो अयोध्यामें मेरा क्या
है ? लोग कहते हैं कि रघुनाथजीके चरणोंको त्याग कर राज्य करो;
ये सब-के-सब इसी धुनमें लगे हुए हैं ॥ १ ॥ मेरी माता धन्य है !
और धन्य हूँ मैं, जिसके लिये यह सारा राजसमाज ध्वंस किया
गया है ! तिसपर भी मुझे अपना राजा बनाकर आपलोग बिना
अग्निके ही दग्ध होना चाहते हैं ॥ २ ॥ आप सबको रघुनाथजीकी
सौगन्ध है, अब मुझसे कोई कुछ न कहे । मैंने बड़ा असह्य दुःख
सहन किया है । मैं बलिहारी जाता हूँ, आइये, सब लोग मिलकर
चित्रकूटको चलें । मैं हा हा खाता हूँ, आपलोग मुझे क्षमा कीजिये
॥ ३ ॥ ऐसा कहकर सबेरा होते ही भरतजीने चित्रकूटका मार्ग
पूछकर उसे ग्रहण किया । उस समय सब लोग उनकी प्रशंसा करने
लगे कि ‘संसारमें जन्म लेकर एकमात्र भरतजीने ही सच्चा लाभ
उठाया है’ ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीके महान् शील
और स्नेहको या तो राम और सीता जानते हैं और या वे लोग
जानते हैं जिनका रामनामसे प्रेम और नेम लगा हुआ है ॥ ५ ॥
[ ६५ ]
भाई ! हौं अवध कहा रहि लैहौं ।
राम-लषन-सिय चरन बिलोकत काल्हि काननहि जैहौं ॥ १ ॥
जद्यपि मोंतें, कैं कुमाततें ह्वै आई अति पोंची ।
सनमुख गए सरन राखिहेंगे रघुपति परम संकोची ॥ २ ॥
तुलसी यों कहि चले भोरही, लोग बिकल सँग लागे ।
जनु बन जरत देखि दारुन दव निकसि बिहँग-मृग भागे ॥ ३ ॥