गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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ताते हौं देत न दूषन तोहू।
रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ॥ १ ॥
सुंदर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए।
बिष-बारुनी-बंधु कहियत बिधु ! नातो मिटत न धोए ॥ २ ॥
होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सबके मन माहीं।
तौ तोरी करतूति, मातु ! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा ही ? ॥ ३ ॥
मृदु, मंजुल सींची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी।
तुलसी 'साधु-साधु' सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ॥ ४ ॥
विधाताने मुझे भी तेरे रामविरोधी कठोर हृदयसे उत्पन्न किया
है इसलिये [तेरा ही होनेके कारण] मैं तो तुझे भी दोष नहीं दे
सकता ॥ १ ॥ देखो, जिसे देखनेसे ही सब प्रकारका ताप शान्त
हो जाता है, वह चन्द्रमा सुन्दर, सुखदायक, शीतल और अमृतका
भण्डार है तो भी उसे विष और वारुणीका बन्धु कहा जाता है !
सच है, नाता धोनेसे नहीं मिटता ॥ २ ॥ यदि सुजानशिरोमणि
भगवान् राम सबके मनमें न बसे होते तो हे माता ! तेरी करतूतको
सुनकर ही प्रभुको मेरी प्रीति और प्रतीति कैसे हो सकती थी ?
[अर्थात् राम सर्वान्तर्यामी हैं, इसलिये तेरी ऐसी कुचाल होनेपर भी
वे अपने प्रति मेरे स्नेह और विश्वासको जानते हैं] ॥ ३ ॥ तुलसीदास
कहते हैं, भरतजीकी यह अत्यन्त मधुर, मनोहर, स्नेहसनी पवित्र
वाणी सुनकर उनके प्रेमको पहचानकर देवता, मनुष्य और मुनिजन
'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ४ ॥