गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ अयोध्याकाण्ड
मरनेपर भी दूर नहीं होगा ॥ १ ॥ देखो, मैंने रामको राजतिलकके
लिये बुलाकर वनवास दे दिया, फिर भी उनके चित्तमें चौगुना
उत्साह बना रहा ! उनका ऐसा शील और स्वभाव जानकर भी
मेरा हृदय दाड़िम (अनार) के समान फट नहीं गया ॥ २ ॥ यदि
सीता, राम और लक्ष्मणके बिना भी मेरी आयु भयसे घबड़ाकर नहीं
भगी तो मुझे यह नहीं जान पड़ता कि इससे बढ़कर और कौन-सा
कठोर घाव होगा ? ॥ ३ ॥ हे सुमन्त ! सुनो, या तो मेरे सुन्दर
पुत्रोंको लाकर मुझे उनके साथ जीवित रक्खो, नहीं तो अब मुझे
मृत्युरूप अमृतका ही पान करा दो' ॥ ४ ॥
[ ५८ ]
अवधि बिलोकि हौं जीवत रामभद्र-बिहीन !
कहा करिहैं आइ सानुज भरत धरमधुरीन ॥ १ ॥
राम-सोक-सनेह-संकुल, तनु बिकल, मनु लीन ।
टूटि तारो गगन-मग ज्यों होत छिन-छिन छीन ॥ २ ॥
हृदय समुझि सनेह सादर प्रेम पावन मीन ।
करी तुलसीदास दसरथ प्रीति-परमिति पीन ॥ ३ ॥
'अब मैं जीवित रहकर अयोध्याको मंगलमूर्ति रामके बिना
देखूंगा । धर्मधुरन्धर भरतजी भी भाई शत्रुघ्नसहित आकर अब क्या
करेंगे ?' ॥ १ ॥ इस प्रकार रघुनाथजीके वियोगसे शोक और उनके
स्नेहसे संकुलित महाराज दशरथका शरीर व्याकुल है और मन
डूबता जा रहा, जैसे टूटा हुआ तारा आकाशमार्गमें क्षण-क्षणमें
क्षीण होता जाता है ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, महाराज दशरथ-
ने मछलीके पवित्र प्रेम और स्नेहको हृदयमें आदरपूर्वक समझकर
प्रीतिकी मर्यादाको ही दृढ़ किया ॥ ३ ॥