गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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रंग छिड़कता हुआ विराजमान हो ॥ ४ ॥ इसने खेलनेमें ही देवता,
असुर और नाग आदिको जीत लिया है तथा यह हठपूर्वक सिद्ध-
मुनीश्वरोंके मार्गमें रोड़े अटकाये हुए है । तुलसीदास कहते हैं—यह
कामदेव तो उसीको छोड़ता है, जिसकी कमलनयन भगवान् राम
रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥
[ ४९ ]
ऋतु-पति आए भलो बन्यो बनसमाज । मानो भए हैं मदन
महाराज आज ॥१॥
मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति । होरीमिस अरिपुर जारि जीति ॥
मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि । नयनगर बसाए बिपिन झारि ॥२॥
सिंहासन सैल-सिला सुरंग । कानन-छबि रति, परिजन कुरंग ॥
सित छत्रसुमन, बल्ली बितान । चामर समीर निरझर निसान ॥३॥
मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर । बर बिपुल बिटप बानैत बीर ॥
मधुकर-सुक-कोकिल बंदि-बृंद । बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छंद ॥४॥
महि परत सुमन-रस फल पराग । जनु देत इतर नृप कर-बिभाग ॥
कलि सचिव सहित नय-निपुन मार । कियो बिस्व बिबस चारिहु
प्रकार ॥५॥
बिरहिनपर नित नई परै मारि । डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि ॥
तिनकीन काम सकै चापि छाँह । तुलसी जे बसहि रघुबीर बाँह ॥६॥
ऋतुराजके आनेपर वनकी शोभा बड़ी भली बन गयी
है, मानो आज कामदेवको महाराज-पद प्राप्त हुआ हो ॥ १ ॥
अतः उन्होंने फागके मिससे मर्यादा छोड़कर [ वनरूप ] शत्रुके
नगरपर विजय प्राप्तकर उसे होलीके बहाने जला ( सुखा )
डाला हो और फिर वायुरूपसे पत्ररूप प्रजाको लूटकर समग्र