गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २१४
लज्जित होते थे ॥ २ ॥ उन्हें राजा दशरथ और रानी
कौसल्या जन्म दिया है। कैकेयीने कुचाल करके उन्हें वनमें भेज
दिया ॥ ३ ॥ भला, उस दुष्टा स्त्रीके वचन राजाको क्यों अच्छे
लगे ? हाय ! हाय ! ! राजाको वाम विधाताने भ्रममें डाल दिया !
॥ ४ ॥ उन्हें कुलगुरु या मन्त्रियोंमेंसे भी किसीने नहीं समझाया;
उन्होंने कांचका मनका लेकर अमूल्य मणिको खो दिया ! ॥ ५ ॥
मार्गके लोगोंके बड़े ही भाग्य हैं जिन्होंने उन्हें देखा और
तुलसीदासके सहित वे भी बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने इनके
गुण गाये हैं ॥ ६ ॥
[ ४० ]
सखि ! जब तें सीता-समेत देखे दोउ भाई ।
तबतें परै न कल, कछू न सोहाई ॥ १ ॥
नखसिख नीके, नीके निरखि निकाई ।
तन-सुधि गई, मन अनत न जाई ॥ २ ॥
हेरनि-हँसनि हिय लिये हैं चोराई ।
पावन-प्रेम-बिबस भईं हौं हराई ॥ ३ ॥
कैसे पितु-मातु, प्रिय परिजन-भाई ।
जीवत जीवके जीवन बनहि पठाई ॥ ४ ॥
समउ सो चित करि हित अधिकाई ।
प्रीति ग्रामबधुनकी तुलसिहु गाई ॥ ५ ॥
अरी सखि ! जबसे सीताजीके सहित दोनों भाइयोंको देखा
है तबसे हमें चैन नहीं पड़ता और न कुछ सुहाता ही है ॥ १ ॥ वे
नखसे शिखातक सुन्दर थे, उनकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर