गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंतरकस तथा हाथोंमें धनुष-बाण धारण किये थे । वे श्याम-गौरवर्ण और
स्वभावसे ही शोभायमान थे ॥ २ ॥ उनका मनोहर मुखमण्डल था,
विशाल वक्षःस्थल और भुजाएँ थीं तथा अपने शरीरकी कान्तिसे वे
करोड़ों कामदेवोंको लज्जित करते थे । उन्हें देखकर मुझे तो चौंधी-
सी लग गयी; मैं तो यह भी नहीं जान सकी कि वे कौन थे और
कहांसे आये थे ? ॥ ३ ॥ मेरा मन तो उन्हींके साथ चला गया,
नेत्र भी सोचवश जल बरसा रहे हैं । मैंने चित्तको बहुत कुछ
समझाया है तो भी उनके दर्शनकी लालसा लगी हुई है, अब इसे
वही पूर्ण करेगा जिसने उन्हें एक बार यहाँ लाकर दिखा
दिया था' ॥ ४ ॥
[ ३६ ]
पुनि न फिरे दोउ बीर बटाऊ ।
स्यामल-गौर, सहजसुंदर, सखि ! बारक बहुरि बिलोकिबे काऊ ॥ १ ॥
कर-कमलनि सर, सुभग सरासन, कटि मुनिबसन-निषंग सोहाए ।
भुज प्रलंब, सब अंग मनोहर, धन्य सो जनक-जननि जेहि जाए ॥ २ ॥
सरद-बिमल बिधु-बदन, जटा सिर, मंजुल अरुन सरोरुह-लोचन ।
तुलसिदास मनमय मारगमें राजत कोटि-मदन-मदमोचन ॥ ३ ॥
'अरी सखि ! वे वीर बटोही इस मार्गसे फिर नहीं लौटे ?
वे श्याम-गौर कुँवर स्वभावसे ही सुन्दर थे । क्या हम उन्हें एक
बार फिर देख सकेंगी ? ॥ १ ॥ उनके कर-कमलोंमें बाण और
सुन्दर धनुष थे तथा कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस शोभायमान
थे । उनकी भुजाएँ लम्बी-लम्बी और सभी अङ्ग अत्यन्त मनोहर
थे । वे माता-पिता, जिन्होने उन्हें जन्म दिया है, धन्य हैं' ॥ २ ॥