गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंधरम-धुरोन धीर बीर रघुबीरजूको,
कोटि राज सहित भरतजूको राजु भो ॥ २ ॥
ऐसी बातें कहत सुनत मग-लोगनकी,
चले जात बंधु दोउ मुनिको सो साज भो ।
ध्याइबेको, गाइबेको, सेइबे सुमिरिबेको,
तुलसीको सब भाँति सुखद समाज भो ॥ ३ ॥
[मार्गस्थ स्त्री-पुरुष कहते हैं—] राजाने राज्य देनेके लिये
कहा था, इतनेहीमें वन जानेकी आज्ञा हो गयी । किन्तु इसपर
रघुनाथजीका तो मुख खिल उठा और मन प्रसन्न हो गया । ये
सोचने लगे—'यह बड़ा भारी काम बना, इसमें माता-पिता और
भाईका भी हित है और मेरा भी परम कल्याण है, आज विधाता
मुझपर बीसों बिस्वे प्रसन्न हुआ है, ॥ १ ॥ फिर इन्होंने राजतिलकको
अजीर्णपरका भोजन (अनिष्टकारी) समझकर त्याग दिया तथा
वनगमनको भूखेके लिये नाजके समान हितकारी समझकर स्वीकार
कर लिया। इस प्रकार परम धीर-वीर, धर्मधुरीण रघुनाथजीके लिये
भरतजीका राजतिलक करोड़ों राज्याभिषेकोंके समान हुआ ॥ २ ॥
मार्गस्थ पुरुषोंके द्वारा कही हुई ऐसी बातें सुनते हुए मुनियोंका सा
साज सजाये दोनों भाई चले जा रहे हैं । तुलसीदासको तो ध्यान
करने, गाने, सेवन करने और स्मरण करनेके लिये यह समाज सभी
प्रकार सुखदायक हुआ ॥ ३ ॥
[ ३४ ]
सिरिस-सुमन-सुकुमारि, सुखमाकी सींव,
सीय राम बड़े ही सकोच संग लई है।