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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 454 में से

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पृष्ठ 180

श्रीसीतारामभ्यां नमः
गीतावली
अयोध्याकाण्ड
राज्याभिषेककी तैयारी
राग सोरठ
[ १ ]
नृप कर जोरि कह्यो गुर पाहीं ।
तुम्हरी कृपा असीस, नाथ ! मेरी सबै महेस निबाहीं ॥ १ ॥
राम होंहि जुबराज जियत मेरे, यह लालच मन माहीं ।
बहुरि मोहि जियबे-मरिबेकी चित चिंता कछु नाहीं ॥ २ ॥
महाराज, भलों काज बिचारयो, बेगि बिलंब न कीजै ।
बिधि दाहिनो होइ तौ सब मिलि जनम-लाहु लुटि लीजै ॥ ३ ॥
सुनत नगर आनंद बधावन, कैकेयी बिलखानी ।
तुलसीदास देवमायाबस कठिन कुटिलता ठानी ॥ ४ ॥
महाराज दशरथने हाथ जोड़कर गुरुजीसे कहा—‘हे नाथ !
आपकी कृपा और आशीर्वादसे महादेवजीने मेरी सभी कामनाएँपूर्णकर
दी हैं ॥ १॥ अब तो मेरे मनमें यही लालच है कि मेरे जीते-जी श्रीराम
युवराज हो जायें । फिर मुझे अपने जीने-मरनेकी चित्तमें कुछ भी
चिन्ता नहीं है’ ॥ २ ॥ [ यह सुनकर वसिष्ठजीबोले— ] ‘राजन् ! तुम-
ने बहुत अच्छा कार्य सोचा है । इसे शीघ्र ही करना चाहिये, देरी
मत करो । यदि विधाता अनुकूल रहे तो सबके साथ मिलकर