गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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अयोध्या-आगमन
राग कान्हरा
[ १०९ ]
भुजनिपर जननी वारि-फेरि डारी।
क्यों तोरचो कोमलकर-कमलनि संभु-सरासन भारी ? ॥ १ ॥
क्यों मारीच सुबाहु महाबल प्रबल ताड़का मारी ? ।
मुनि-प्रसाद मेरे राम-लषनकी बिधि-बड़ि करवर टारी ॥ २ ॥
चरनरेनु लै नयननि लावति, क्यों मुनिबधू उधारी ।
कहौ धौं तात ! क्यों जीति सकल नृप बरी है बिदेहकुमारी ॥ ३ ॥
दुसह-रोष-मूरति भृगुपति अति नृपति-निकर-खयकारी ।
क्यों सौंप्यो सारंग हारि हिय, करी है बहुत मनुहारी ॥ ४ ॥
उमगि आनंद बिलोकति बधुसहित सुत चारी ।
तुलसिदास आरती उतारति प्रेम-मगन महतारी ॥ ५ ॥
माता कौसल्या भगवान् रामकी भुजाओंपर वार-फेर करती हैं
और कहती हैं—'भला, इन कोमल करकमलोंसे महादेवजीका
भारी धनुष किस प्रकार तोड़ा होगा ॥ १ ॥ इनसे महाबली मारीच
और सुबाहु तथा प्रबल ताड़काको भी कैसे मारा होगा ; विश्वामित्र-
जीकी कृपासे विधाताने मेरे लाल राम और लक्ष्मणकी बड़ी भारी
आपत्ति टाल दी है' ॥ २ ॥ फिर भगवान्के चरणोंकी रज लेकर
नेत्रोंसे लगाती हैं और कहती हैं—'हे तात ! कहो तो तुमने किस
प्रकार मुनिपत्नीका उद्धार किया ? और कैसे सारे राजाओंको जीत-
कर जानकीको विवाहा ? ॥ ३ ॥ परशुराम तो दुःसह क्रोधकी मूर्ति
और नृपसमूहका क्षय करनेवाले हैं। उन्होंने हृदयमें हारकर किस