गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१६५ बालकाण्ड
पत्नीरूपसे स्त्रीरत्न सीताको प्राप्त किया' ॥ ४ ॥ यह सुहावना
समाचार सुनकर नगरमें घर-घर परम आनन्द हो रहा है। माताएँ
प्रसन्न होकर मङ्गलके साज सजाती हैं और कहती हैं—'माई !
मुनीश्वरकी कृपासे ही ये सारे सुमङ्गल हुए हैं, ॥ ५ ॥ फिर
गुरुजीकी आज्ञा पा, सब प्रकारकी सामग्रियोंसे सजाकर मण्डप रचा
गया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार महाराज दशरथ बरात
सजाकर गणेशजीका पूजनकर निसान बजाते हुए चले ॥ ६ ॥
राग केदारा
[ १०४ ]
मनमें मंजु मनोरथ हो, री !
सोहर-गौरि-प्रसाद एकतें, कौसिक, कृपा चौगुनो भो, री ! ॥ १ ॥
पन-परिताप, चाप-चिंता-निसि, सोच-सकोच-तिमिर नहिं थोरी।
रबिकुल-रबि अवलोकि सभा-सर हितचित-बारिज-बन बिकसोरी ॥ २ ॥
कुँवर-कुँवरि सब मंगल मूरति, नृप दोउ धरमधुरंधर-धोरी।
राजसमाज भूरिभागी, जिन लोचन लाहु लह्यो एक ठौरी ॥ ३ ॥
ब्याह-उछाह राम-सीताको सुकृत सकेलि बिरंचि रच्यो, री।
तुलसिदास जानै सोइ यह सुख, जेहि उर बसति मनोहर जोरी ॥ ३ ॥
[बरात देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ कहने लगीं—] अरी
सखि ! हमारे मनमें जो एक मनोहर मनोरथ था वह श्रीशङ्कर और
पार्वतीजीके प्रसादसे तथा विश्वामित्रजीकी कृपासे चौगुना हो
गया ॥ १ ॥ प्रणके पश्चात्ताप और चापरूप चिन्ताकी रात्रिमें
[ धनुष न टूटनेका ] सोच और [ प्रण छोड़नेका ] संकोचरूप
अन्धकार कुछ कम नहीं था; किन्तु सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको