सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

गीतावली १६०
कलेवा निकाल कर देगा और कौन आभूषण पहनाकर निछावर
करते हुए नेत्रोंका आनन्द लूटेगा ! ॥ २ ॥ जिन्हें पिता, परिजन
और माताएँ सर्वदा नेत्रोंकी पलकोंके समान सँभाल रखती थीं, उन्हें
राजाने यज्ञकी रखवाली और निशाचरोंका संहार करनेके लिये
विश्वामित्रजीके साथ भेज दिया ! ॥ ३ ॥ हे विधाता ! क्या कभी
वह दिन आवेगा जब मैं उन अति सुन्दर, सलोने, सुकुमार, सुकोमल
और काकपक्षधारी दोनों बालकोंको देखकर हर्षित हो हृदयसे
लगाऊँगी ?' ॥ ४ ॥
[ १०० ]
ऋषि नृप-सीस ठगौरी-सी डारी ।
कुलगुर, सचिव, निपुन नेवनि अवरेब न समुझि सुधारी ॥ १ ॥
सिरिस-सुमन-सुकुमार कुँवर दोउ, सूर सरोष सुरारी ।
पठए बिनहि सहाय पयादेहि केलि-बान-धनुधारी ॥ २ ॥
अति सनेह-कातरि माता कहै, सुनि सखि ! बचन दुखारी ।
बादि बीर-जननी-जीवन जग, छत्रि-जाति-गति भारी ॥ ३ ॥
जो कहिहै फिरे राम-लषन घर करि मुनिमख-रखवारी ।
सो तुलसी प्रिय मोहिं लागिहै ज्यौं सुभाय सुत चारी ॥ ४ ॥
'ऋषिवर विश्वामित्रजीने तो राजाके मस्तकपर कुछ जादू-सा
कर दिया । इस विपरीत स्थितिका कुलगुरु, मन्त्री और निपुण
नायकोंने भी बुद्धिपूर्वक सुधार नहीं किया ! ॥ १ ॥ देखो, दोनों
कुमार तो सिरसके फूलके समान सुकुमार हैं और राक्षसलोग बड़े
शूरवीर तथा क्रोधी हैं । फिर भी क्रीडाके धनुष-बाण लिये उन्हें
बिना किसी प्रकारकी सहायताके पैदल ही भेज दिया' ॥ २ ॥