गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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देती है ॥ २ ॥ इन्हें हार्दिक प्रेमसहित देख । नखसे शिखापर्यन्त
इनका प्रत्येक अङ्ग यथायोग्य रूपसे सुशोभित है । इन्हें देखकर
अपने पुण्य, सीतारामके रूप तथा [इन मूर्तियोंको रचनेवाले]
विधाताकी बुद्धिकी सराहना कर ॥ ३ ॥ प्रसन्न मनके कारण
सुन्दर मुखमण्डलकी शोभापर और भी अधिक उत्साह उदित हो
रहा है, मानो चन्द्रमाने अपना कलङ्क दूर कर युद्धमें राहुको मार
डाला हो ॥ ४ ॥ इनके सुषमासदन नयन कमलकी भी सुन्दरताको
हर लेते हैं । ऐसे ये जानकीपति तुलसीदासके हृदयरूप पुरमें
विराजते हैं ॥ ५ ॥
राग सारङ्ग
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भूपके भागकी अधिकाई ।
टूट्यौ धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ॥ १ ॥
तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई ।
अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ॥ २ ॥
बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई ।
एहि आनंद मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ॥ ३ ॥
सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई ।
यह सुख समउ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ॥ ४ ॥
[कोई सखी कहती है—] 'यह महाराज जनकके भाग्यकी
अधिकता ही है कि धनुष टूट गया, मनोरथ पूर्ण हो गया और
विधाताने सारी बात बना दी ॥ १ ॥ जबसे जानकीका जन्म हुआ है
तबसे जनकजीकी दिनोंदिन उन्नति हो रही है । अब इसका