गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५३ बालकाण्ड
राग तोड़ी
[ ९४ ]
जनक मुदित मन टूटत पिनाकके ।
बाजे हैं बधावने, सुहावने मंगल-गान,
भयो सुख एकरस रानी राजा राँकके ॥ १ ॥
दुंदुभी बजाइ, हरषि बरषि फूल,
सुरगन नाचैं नाच नायकहू नाकके ।
तुलसी महीस देखे दिन रजनीस जैसे,
सूने परे सून-से मनो मिटाए आँकके ॥ २ ॥
धनुषके टूटते ही जनकजी मनमें प्रसन्न हो गये। इससे
सुहावने बधावे बजने लगे तथा मंगलगान आरम्भ हो गया। उस
समय राजा, रानी और रङ्कको एक समान आनन्द हुआ ॥ १ ॥
देवता और स्वर्गके अधिपति भी दुन्दुभी बजाते और आनन्दसे गाते
हुए फूलोंकी वर्षा कर नाचने लगे। तुलसीदास कहते हैं, उस समय
वे मानो दिनके चन्द्रमाके समान ( मलिन ) जान पड़ते थे।
वे मानो अङ्कके मिटा देनेपर शून्यके समान सूने-से ( नगण्य ) हो
गये थे ॥ २ ॥
[ ९५ ]
लाज तोरि, साजि साज राजा राढ़ रोषे हैं।
कहा भौ चढ़ाए चाप, ब्याह ह्वै है बड़े खाए,
बोलैं, खौलैं सेल, असि चमकत चोखे हैं ॥ १ ॥
जानि पुरजन त्रसे, धीर दै लषन हँसे,
बल इनको पिनाक नीके नापे-जोखे हैं।