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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 454 में से

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पृष्ठ 149

१४३ बालकाण्ड
भूमि-भोग करत अनुभवत जोग-सुख
मुनि-मन-अगम अलख गति जान को ?
गुर-हर-पसे-नेहु, गेह बसि भी बिदेह,
अगुन-सगुन-प्रभु-भजन-सयान को ? ॥ २ ॥
कहनि रहनि एक, बिरति बिबेक नीति,
बेद-बुध-संमत पथी न निरबानको ?
गाँठि बिनु गुनकी कठिन जड़-चेतनकी,
छोरी अनायास, साधु सोधक अपानको ॥ ३ ॥
सुनि रघुबीरकी बचन-रचनाकी रीति,
भयो मिथिलेस मानो दीपक बिहानको ।
मिट्यो महामोह जीको, छूट्यो पोच सोच सीको,
जान्यो अवतार भयो पुरुष पुरानको ॥ ४ ॥
सभा, नृप, गुर, नर-नारि पुर, नभ सुर
सब चितवत मुख करुनानिधानको ।
एकै एक कहत प्रगट एक प्रेम-बस
तुलसीस तोरिए सरासन इसानको ॥ ५ ॥
[भगवान् राम बोले-] 'हे ऋषिराज ! आज जनकजीके
समान और कौन राजा है ? जिनकी आप इस प्रकार प्रीतिपूर्वक
सराहना कर रहे हैं ? अहा ! इनके समान रागी एवं साथ ही
विरागी दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? ॥ १ ॥ ये पृथ्वीका भोग
करते हुई योगसुखका भी अनुभव करते हैं। इनकी गति अलक्षित और
मुनियोंके भी मनको अगम है, उसे कौन जान सकता है ? इनका
श्रीगुरु और भगवान् शङ्करके चरणोंमें प्रेम है, ये घरमें रहते हुए
भी विदेहभावको प्राप्त हो गये हैं। इनके समान निर्गुण तथा सगुण