गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१४१ बालकाण्ड
नहीं रचा है ? ॥ ४ ॥ मुझे अपने प्रणका मोह नहीं है और न सीता-
हीकी विशेष चिन्ता है, क्योंकि जिस पुरुषने जो कुछ बोया है वह
वही काटेगा ! [ मैं तो यही चाहता हूँ कि] रघुनाथजीकी नीकी
निकाई नीकी ही बनी रहे, इसलिये हे प्रभो ! यह तो आपहीके
हाथ है, जिनकी कि बड़ी विचित्र करतूत है' ॥ ५ ॥ तब विश्वा-
मित्रजीने साधु-साधु कहकर महाराज जनककी प्रशंसा की और
कहा—'राजन् ! आपने अपने हृदयमें उचित जानकर बहुत ठीक
बात निश्चय कर रक्खी है। [ राजा जनकका भाव जानकर ]
लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए और हृदयमें बिलखते हुए पुरवासीलोग भी
आनन्दमग्न हो गये । जिसके राजा महाराज राम विजयी हैं, वह
तुलसीदास भी अत्यन्त प्रसन्न है ॥ ६ ॥
[ ८७ ]
सुजन सराहें जो जनक बात कही है।
रामहि सोहानी जानि, मुनिमनमानी सुनि,
नीच महिपवली दहन बिनु दही है ॥ १ ॥
कहैं गाधिनंदन मुदित रघुनंदनसों,
नृपगति अगह, गिरा न जाति गही है।
देखे-सुने भूपति अनेक झूठे झूठे नाम
सांचे तिरहुतिनाथ, साखि देति मही है ॥ २ ॥
रागऊ बिराग, भोग जोग जोगवत मन,
जोगी जागबलिक प्रसाद सिद्धि लही है।
ताते न तरनितें, न सीरे सुधाकरहूतें
सहज समाधि निरुपाधि निरबही है ॥ ३ ॥