गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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राग केदारा
[ ८१ ]
रामहि नीके कै निरखि, सुनैनी !
मनसहु अगम समुझि, यह अवसरु कत सकुचति, पिकबैनी ॥ १ ॥
बड़े भाग मख-भूमि प्रगट भई सीय सुमंगल-ऐनी।
जा कारन लोचन गोचर भइ मूरति सब सुखदैनी ॥ २ ॥
कुलगुर-तियके मधुर बचन सुनि जनक-जुवति मति, पैनी।
तुलसी सिथिल देह-सुधि-बुधि करि सहज सनेह-बिषैनी ॥ ३ ॥
[शतानन्दजीकी स्त्री जानकीजीकी मातासे कहती हैं—] 'हे
सुनयनी ! तू रामचन्द्रजीको अच्छी तरह देख ले। अरी पिकभाषिणा!
उन्हें तू मनसे भी अगम समझ। इस अवसरपर तू सकुचाती क्यों
है ? ॥ १ ॥ जिसके कारण यह सब प्रकारके सुख देनेवाली मधुर
मूर्ति हमारे नेत्रोंका विषय हुई है, वह सब प्रकारके सुमङ्गलोंकी
आश्रयभूता सीता हमारे परम सौभाग्यसे ही यज्ञभूमिमें प्रकट हुई
हैं' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—अपने कुलगुरुकी स्त्रीके ये मधुर
वचन सुनकर कुशाग्रबुद्धि जनकप्रिया शरीरकी सुध-बुध भूलकर
भगवान्की ओर स्वाभाविक स्नेहसे देखने लगीं ॥ ३ ॥
[ ८२ ]
मिलो बरु सुंदर सुंदरि सीतहि लायकु,
साँवरो सुभग, सोभाहूँको परम सिंगारु।
मनहूँको मन मोहै, उपमाको को है ?
सोहै सुखमासागर संग अनुज राजकुमारु ॥ १ ॥
ललित सकल अंग, तनु धरे कै अनंग,
नैननिको फल कैधौं, सियको सुकृत-सारु।