सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

गीतावली
१३०

॥ 'अरी सखि ! सुन, महाराज जनकने बड़ा ही अच्छा कियां
है। देखौं, उनकी कृपासे ही महाराज दशरथके इन दोनों कुमारोंको
देखकर नगरनिवासी जीवन धारण कर रहे हैं ॥ १ ॥ मेरे कहनेसे
विश्वास कर, चित्तको सन्देहवश क्यों करती है ! यह महादेवजीका
धनुष तभीतक दीखता है जबतक रघुनाथजी इसे नहीं लेते ॥ २ ॥
जिसे विधाताने सीताजीको सँवारकर रचा है और रामको ऐसा
रूप दिया है—तुलसीदास कहते हैं—उस चतुर विधाताने ही अपने
हाथसे यह संयोग मिलाया है' ॥ ३ ॥

[ ८० ]
अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं।
नीलकंठ कारुन्यसिंधु हर दीनबन्धु दिनदानि हैं ॥ १ ॥
जो पहिले ही पिनाक जनक कहँ गए सौंपि जिय जानि हैं।
बहुरि त्रिलोचन लोचनके फल सबहि सुलभ किये आनि हैं ॥ २ ॥
सुनियत भव-भावते राम हैं, सिय भावति-भवानि हैं।
परखत प्रीति प्रतीति, पयज-पनु रहे काज ठटु ठानि हैं ॥ ३ ॥
भये बिलोकि बिदेह नेहबस बालक, बिनु पहिचानि हैं।
होत हरे होने बिरबनि दल सुमति कहति अनुमानि हैं ॥ ४ ॥
देखियत भूप भोरके-से उडुगन, गरत गरीब गलानि हैं।
तेज प्रताप बढ़त कुँवरनको, जदपि संकोची बानि हैं ॥ ५ ॥
बय किसोर, बरजोर, बाहुबल-मेरु मेलि गुन तानि हैं।
श्रवसि राम राजीव-बिलोचन संभु-सरासन भानि हैं ॥ ६ ॥
देखिहैं ब्याह-उछाह नारि-नर, सकल-सुमंगल-खानि हैं।
भूरिभाग तुलसी तेऊ, जे सुनिहैं, गाइहैं, बखानि हैं ॥ ७ ॥