गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१२७ बालकाण्ड
'हे माई ! देखो, दोनों भाई सीताजीका स्वयंवर देखने आये
हैं'—यह सुनते ही सब स्त्रियाँ शरीरमें पुलकित हो मानो मनोहर
कामदेवको निहारनेके लिये प्रसन्न चित्तसे जा रही हैं ॥ १ ॥ उनकी
सुन्दरता देखकर वे चित्तमें सुख पाकर एक दूसरीसे कहती हैं—
'अरी आली ! आज इस समय तो हम बड़ी भाग्यशालिनी और धन्य
हैं।' तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे सब सहज प्रेमरूप सुन्दर
रङ्गसे अपने चित्तरूप चित्रशालामें उस समाजका चित्र खींचनेमें
लग गयीं ॥ २ ॥
राग गौरी
[ ७६ ]
राम-लषन जब दृष्टि परे, री।
अवलोकत सबलोगजनकपुर मानो बिधि बिबिध बिदेह करे, री ॥ १ ॥
धनुषजग्य कमनीय अवनि-तल कौतुकही भए आय खरे, री।
छबि-सुर सभा मनहु मनसिजके कलित कलपतरु रूप फरे, री ॥ २ ॥
सकल काम बरषत मुख निरखत, करषत चित हित हरष भरे, री।
तुलसी सबै सराहत भूपहि भलैं पैंत पासे सुढर ढरे, री ॥ ३ ॥
'अरी सखि ! जबसे राम लक्ष्मण दृष्टिगोचर हुए हैं तबसे उन्हें
देखनेवाले जनकपुरके लोगोंकी दशा ऐसी हो गयी है, मानो विधाता-
ने अनेक विदेह बनाये हैं ॥ १ ॥ इसी समय धनुषयज्ञकी सुरम्य
भूमिमें कौतुकसे ही दोनों भाई आ खड़े हुए, मानो छबिरूप देव-
सभामें कामदेवके दो मनोहर कल्पवृक्ष सौन्दर्यरूपी फलसे फलित
हुए हों ॥ २ ॥ अरी ! इनका मुख देखते ही सारी कामनाओंकी