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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 454 में से

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पृष्ठ 117

१११ बालकाण्ड
[महाराज जनक पूछते हैं—] ये कौन हैं और कहांसे आये हैं?
ये नीले और पीले कमलके समान श्याम एवं गौर-वर्ण, अत्यन्त
मनमोहन और स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥ १ ॥ ये बालक कोई
मुनिपुत्र हैं या राजकुमार अथवा परब्रह्म और जीव (हिरण्यगर्भ)
ही जगत्‌में उत्पन्न हो गये हैं। ये दोनों लालन रूपसमुद्रके रत्न
अथवा छबिरूप रमणीके सुललित लोचन तो नहीं हैं? ॥ २ ॥
अथवा ये दोनों अश्विनीकुमार, कामदेव और ऋतुराज बसन्त अथवा
श्रीविष्णु और महादेव ही [मनुष्यका] वेष धरकर आ गये हैं?
अथवा आपने अपने सुकृतरूप कल्पतरुके सुन्दर फल ही पा लिये हैं?
॥ ३ ॥ ऐसा कहकर जनकजी स्नेहवश विदेह हो गये। अपने शरीर-
की सुधि भूल गये। उनका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें आनन्द
नहीं अँटता था तथा नेत्रोंमें जल छा गया ॥ ४ ॥ जनकजीके मृदुल,
मनोहर और भक्तिरस भरे सुमधुर वचन विश्वामित्रजीको बड़े ही
प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, तब विश्वामित्रजीने हृदयमें
आनन्दसे अत्यन्त उमगकर राम-लक्ष्मणके गुण गाये ॥ ५ ॥
[ ६६ ]
कौसिक कृपालहूको पुलकित तनु भौ।
उमगत अनुराग, सभाके सराहे भाग,
देखि दसा जनककी कहिबेको मनु भौ ॥ १ ॥
प्रीतिके न पातकी, दियेहू साप पाप बड़ो,
मख-मिस मेरो तब अवध-गवनु भौ।
प्रानहूते प्यारे सुत माँगे दिये दसरथ,
सत्यसिंधु सोच सहे, सूनो सो भवनु भौ ॥ २ ॥