गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०७ बालकाण्ड
प्राणोंसे भो प्रिय जान पड़े ॥ ३ ॥ हृदयसे ब्रह्मानन्दका तथा नेत्रोंसे
दर्शनके आनन्दका अनुभव कर महाराज जनकने रामरूपको ही
अधिक सरस जाना है [अर्थात् दर्शनसुखको ही विशेष समझा है] ।
तुलसीदासजी कहते हैं, विदेहके स्नेहकी दशा स्मरण कर मेरे मनको
तो यही जान पड़ता है कि महाराज बड़े ही चतुर हैं ॥ ४ ॥
राग मलार
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कोसलरायके कुअँरोटा ।
राजत रुचिर जनक-पुर पैंठत स्याम गैर नीके जोटा ॥ १ ॥
चौतनि सिरनि, कनककली काननि, कटि पट पीत सोहाये ।
उर-मनि-माल, बिसाल बिलोचन, सीय-स्वयंबर आये ॥ २ ॥
बरनि न जात, मनहिं मन भावत, सुभग अबहिं बय थोरी ।
भई हैं मगन बिधुबदन बिलोकत बनिता चतुर चकोरी ॥ ३ ॥
कहँ सिवचाप, लरिकवनि बूझत, बिहँसि चितै तिरछौंहैं ।
तुलसी गलिन भीर, दरसन लगि लोग अटनि आरोहैं ॥ ४ ॥
जनकपुरमें प्रवेश करते समय कोसलराजकुमारोंकी अति सुन्दर
गौर-श्याम जोड़ी बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ १ ॥ दोनों
बालकोंके सिरपर चौतनी टोपी, कानोंमें सुवर्णकली, कमरमें पीताम्बर
और हृदयपर मणियोंकी माला शोभायमान है। उनके नेत्र बड़े
विशाल हैं। इस प्रकार वे सीताजीके स्वयंवरमें पधारे ॥ २ ॥ उस
जोड़ीका वर्णन नहीं होता, वह मन-ही-मन बड़ी भली जान पड़ती
है। अभी अवस्था भी बहुत थोड़ी है। उनके मुखचन्द्रको निहारकर
चतुर चकोरीरूप नगरकी नारियाँ प्रसन्न हो रही हैं ॥ ३ ॥ भगवान्