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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • अवधूतगीता (१) *
    ५१३

इह बोधतमं खलु मोक्षसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १३ ॥

वह आत्मा भाव तथा अभावसे रहित है; वह काम तथा अकामसे रहित है। वह आत्मा परम बोधस्वरूप तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १३ ॥

इह तत्त्वनिरन्तरतत्त्वमिति
न हि सन्धिविसन्धिविहीन इति।
यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १४ ॥

इस आत्मामें यह तत्त्व है या निरन्तरता ही तत्त्व है—ऐसा भेद नहीं होता है; यह सन्धि तथा विसन्धिसे रहित है। यदि यह सर्वसे रहित तथा सर्वसम है, तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १४ ॥

अनिकेतकुटी परिवारसमं
इह सङ्गविसङ्गविहीनपरम्।
इह बोधविबोधविहीनपरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १५ ॥

तुम्हारे लिये एकान्त कुटियामें रहना या परिवारके बीच रहना समान है, उसी तरह संग-असंग और ज्ञान-अज्ञानके द्वन्द्वसे परे तुम्हारी स्थिति है। तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १५ ॥

अविकारविकारमसत्यमिति
अविलक्षविलक्षमसत्यमिति ।
यदि केवलमात्मनि सत्यमिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १६ ॥

विकाररहित और विकारवान् दोनों ही असत्य हैं, प्रत्यक्ष और